Rupee All-Time Low: डॉलर के मुकाबले रुपया 94.29 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर, जानिए कारण और असर

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Rupee All-Time Low डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 94.29 के ऐतिहासिक निचले स्तर पर आ गया है। पश्चिम एशिया में तनाव और महंगे क्रूड ऑयल ने बढ़ाई टेंशन। पढ़ें पूरी खबर।


Rupee All-Time Low



नई दिल्ली, 27 मार्चः भारतीय करेंसी मार्केट से एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। अमेरिकी डॉलर (US Dollar) के मुकाबले भारतीय रुपया (Indian Rupee) अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर लुढ़क गया है। लगातार बढ़ते ग्लोबल तनाव और कच्चे तेल की आसमान छूती कीमतों ने रुपये की कमर तोड़ दी है। शुक्रवार को शुरुआती कारोबार में ही रुपये ने गोता लगाया और यह 94 के अहम आंकड़े को पार कर गया।


अर्थशास्त्रियों और मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह गिरावट सिर्फ आंकड़ों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसका सीधा असर आम आदमी की जेब, देश की महंगाई और रिजर्व बैंक की नीतियों पर पड़ने वाला है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि रुपये में आई इस भारी गिरावट की असली वजह क्या है और आगे इसके क्या परिणाम हो सकते हैं।


क्या है रुपये का ताजा हाल?

विदेशी मुद्रा बाजार (Forex Market) में शुक्रवार का दिन भारतीय करेंसी के लिए बेहद भारी साबित हुआ। शुरुआती कारोबार में ही रुपया 33 पैसे टूटकर डॉलर के मुकाबले 94.29 के अपने नए ऐतिहासिक निचले स्तर (All-Time Low) पर आ गया। अगर हम पिछले ट्रेडिंग सेशन की बात करें, तो बुधवार को घरेलू करेंसी 93.96 के स्तर पर बंद हुई थी।


यह गिरावट अचानक नहीं आई है। इस हफ्ते की शुरुआत में ही लोकल करेंसी अपने पिछले सबसे निचले स्तर 93.98 पर आ गई थी। आंकड़े बताते हैं कि पिछले महीने के आखिर में जब से पश्चिम एशिया (Middle East) में युद्ध और तनाव की स्थिति शुरू हुई है, तब से लेकर अब तक रुपये में लगभग 3.5% की बड़ी गिरावट दर्ज की जा चुकी है।


रुपये के औंधे मुंह गिरने के 3 बड़े कारण

रुपये में आ रही इस ऐतिहासिक गिरावट के पीछे मुख्य रूप से ग्लोबल कारण जिम्मेदार हैं। इसे हम इन तीन बिंदुओं से समझ सकते हैं:

1) पश्चिम एशिया का युद्ध और तनाव: 27 मार्च को रुपये में भारी गिरावट इसलिए आई क्योंकि इस बात की चिंता बढ़ गई है कि पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध अब लंबा खिंचेगा। जब भी वहां तनाव बढ़ता है, तो पूरी दुनिया की सप्लाई चेन हिल जाती है।

2) एनर्जी सप्लाई और क्रूड ऑयल का संकट: भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा कच्चा तेल (Crude Oil) विदेशों से मंगाता है। युद्ध के कारण एनर्जी सप्लाई का संकट पैदा हो गया है। लंबे समय तक चलने वाले इस 'एनर्जी शॉक' के डर से कच्चे तेल की कीमतें $100 प्रति बैरल के निशान से ऊपर बनी हुई हैं। तेल महंगा होने का मतलब है कि भारत को इसे खरीदने के लिए ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ेंगे, जिससे रुपये पर भारी दबाव पड़ता है।

3) ग्लोबल इक्विटी और बॉन्ड यील्ड: ग्लोबल मार्केट में मची उथल-पुथल के कारण विदेशी निवेशक अपना पैसा सुरक्षित जगहों पर लगा रहे हैं। इससे ग्लोबल इक्विटी पर दबाव पड़ा है और बॉन्ड यील्ड बढ़ गई है। जब विदेशी निवेशक भारतीय बाजार से पैसा निकालते हैं, तो रुपये की वैल्यू अपने आप कम होने लगती है।


एक्सपर्ट्स की राय: क्या 98 तक पहुंच जाएगा रुपया?

करेंसी मार्केट पर नजर रखने वाले एक्सपर्ट्स फिलहाल कोई राहत भरी खबर नहीं दे रहे हैं। CR फॉरेक्स एडवाइजरी के मैनेजिंग डायरेक्टर अमित पाबारी (Amit Pabari) ने मौजूदा स्थिति पर बारीकी से अपनी बात रखी है। उन्होंने कहा, "हालांकि इस लड़ाई के ग्लोबल असर को देखते हुए यह साफ है कि तनाव कम करने का दबाव बढ़ रहा है, लेकिन उस नतीजे तक पहुंचने का रास्ता अभी बिल्कुल भी साफ नहीं है।"


पाबारी ने एक उम्मीद की किरण भी दिखाई। उनका कहना है, "अगर भविष्य में तनाव काफी कम होता है, तो रुपये में लगभग 1 से 1.5 रुपये की रिकवरी देखने को मिल सकती है। लेकिन जब तक स्थिति पूरी तरह से साफ नहीं होती, तब तक बाजार में ऐसा ही भारी उतार-चढ़ाव बना रहने की संभावना है।"


वहीं दूसरी तरफ, मशहूर रिसर्च फर्म बर्नस्टीन (Bernstein) का अनुमान और भी डराने वाला है। फर्म का मानना है कि अगर इस लंबे टकराव से दुनिया बच भी जाती है, तो भी इस साल (2024) रुपये के 98 डॉलर के लेवल को पार करने की पूरी संभावना है। बर्नस्टीन के मुताबिक, यह दबाव मुख्य रूप से भारत के करंट अकाउंट बैलेंस (Current Account Balance) के बिगड़ने से आएगा, क्योंकि महंगे आयात (Imports) के कारण देश का व्यापार घाटा तेजी से बढ़ेगा।




आम आदमी और भारत की अर्थव्यवस्था पर असर

जब भी रुपया कमजोर होता है और डॉलर मजबूत होता है, तो इसका सबसे पहला असर आम आदमी की रसोई और उसके बजट पर पड़ता है।


महंगाई का खतरा (Inflation Risk): भारत एक इम्पोर्ट बेस्ड (आयात पर निर्भर) देश है। हम इलेक्ट्रॉनिक सामान से लेकर खाने का तेल और कच्चा तेल विदेशों से डॉलर में खरीदते हैं। रुपया गिरने से हमें वही सामान खरीदने के लिए ज्यादा पैसे चुकाने होंगे। इससे देश में पेट्रोल-डीजल से लेकर रोजमर्रा की चीजों के दाम बढ़ सकते हैं।


ग्रोथ रेट पर ब्रेक: स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कई बड़े एनालिस्ट्स ने भारत के लिए अपनी ग्रोथ (Economic Growth) के अनुमानों को कम कर दिया है।


लोन हो सकते हैं महंगे: महंगे आयात से जब महंगाई बढ़ेगी, तो उसे कंट्रोल करने के लिए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) को सख्त कदम उठाने पड़ेंगे। कई एक्सपर्ट्स को उम्मीद है कि अगले 12 महीनों में RBI ब्याज दरों (Interest Rates) में बढ़ोतरी कर सकता है। अगर ऐसा हुआ तो आपकी होम लोन और कार लोन की EMI बढ़ जाएगी।




क्या कर रहा है रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI)?

बाजार में मची इस अफरातफरी के बीच सभी ट्रेडर्स की नजरें RBI के एक्शन पर टिकी हुई हैं। हर कोई यह देख रहा है कि केंद्रीय बैंक स्पॉट और नॉन-डिलीवरेबल फॉरवर्ड (NDF) मार्केट में कब और कितना दखल देता है।


राहत की बात यह है कि RBI मूकदर्शक बनकर नहीं बैठा है। पिछले ट्रेडिंग सेशन में करेंसी में भारी गिरावट को रोकने के लिए RBI काफी एक्टिव रहा। केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) से डॉलर बेचकर रुपये को संभालने की पूरी कोशिश कर रहा है ताकि गिरावट की रफ्तार को थामा जा सके।


कुल मिलाकर देखा जाए तो भारतीय रुपये का भविष्य फिलहाल ग्लोबल हालात, विशेष रूप से पश्चिम एशिया के तनाव और कच्चे तेल की कीमतों पर निर्भर करता है। जब तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शांति बहाल नहीं होती और क्रूड ऑयल के दाम $100 के नीचे स्थिर नहीं होते, तब तक भारतीय करेंसी के लिए दिन मुश्किल भरे रहेंगे। निवेशकों और आम जनता को आने वाले कुछ हफ्तों तक इस उतार-चढ़ाव के लिए मानसिक और आर्थिक रूप से तैयार रहना चाहिए।


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