Petrol Diesel Price: कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अमेरिका-ईरान तनाव के कारण तेल कंपनियों को पेट्रोल पर 18 और डीजल पर 25 रुपये का नुकसान हो रहा है। जानें भारत में कब और कितने बढ़ेंगे दाम।
नई दिल्ली, 11 मई: अगर आप भी अपनी कार या बाइक में पेट्रोल या डीजल भरवाने जा रहे हैं, तो यह खबर आपके लिए बेहद अहम है। पिछले काफी समय से देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतें स्थिर बनी हुई हैं। आम आदमी को भले ही इससे राहत महसूस हो रही हो, लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में लगातार हो रहे उछाल और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने भारत सरकार और तेल कंपनियों की नींद उड़ा दी है।
हालात यह हो गए हैं कि सरकारी तेल कंपनियों को हर लीटर पर भारी घाटा सहना पड़ रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल ही में देशवासियों से अपील की थी कि वे पेट्रोल और डीजल का इस्तेमाल कम करें। अब इस अपील को आने वाले समय में फ्यूल की कीमतों में होने वाली बड़ी बढ़ोतरी के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि पूरा मामला क्या है, तेल कंपनियों को कितना घाटा हो रहा है और आपकी जेब पर इसका कितना सीधा असर पड़ने वाला है।
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| Petrol Diesel Price |
सरकारी तेल कंपनियों (OMCs) का हाल हुआ बेहाल
भारत में पेट्रोल और डीजल बेचने वाली मुख्य सरकारी कंपनियां जैसे BPCL, HPCL और IOCL इस वक्त भारी दबाव में काम कर रही हैं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने 10 मई को अपने लिंक्डइन (LinkedIn) पोस्ट में एक चौंकाने वाला आंकड़ा शेयर किया था। उन्होंने बताया कि इस तिमाही में इन तेल कंपनियों (OMCs) की अंडर रिकवरी (लागत से कम कीमत पर बेचने से होने वाला नुकसान) 2 लाख करोड़ रुपये के डरावने आंकड़े तक पहुंच सकती है। वहीं, इन कंपनियों का अनुमानित नुकसान करीब 1 लाख करोड़ रुपये बताया जा रहा है।
केंद्रीय मंत्री के मुताबिक, पश्चिम एशिया (Middle East) में चल रहे गंभीर संकट के कारण भारतीय तेल कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार से बहुत महंगे दामों पर कच्चा तेल, गैस और LPG खरीदना पड़ रहा है। लेकिन, देश की जनता को महंगाई की मार से बचाने के लिए सरकार के निर्देश पर ये कंपनियां पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) बहुत कम कीमत पर बेच रही हैं। इसका नतीजा यह हो रहा है कि इन कंपनियों को हर दिन करीब 1000 करोड़ रुपये का भारी-भरकम नुकसान झेलना पड़ रहा है। कोई भी कंपनी इतने लंबे समय तक रोज 1000 करोड़ का घाटा सहकर काम नहीं कर सकती।
एक लीटर पर कितना हो रहा है नुकसान?
अगर हम गणित को समझें, तो मौजूदा समय में अंतरराष्ट्रीय बाजार से तेल खरीदकर उसे रिफाइन करने और पेट्रोल पंप तक पहुंचाने की जो लागत आ रही है, वह बहुत ज्यादा है। एक अनुमान के मुताबिक, सरकारी तेल कंपनियां इस वक्त पेट्रोल पर लगभग 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 25 रुपये प्रति लीटर का घाटा सह रही हैं।
इसका सीधा सा मतलब यह है कि अगर इन कंपनियों (BPCL, HPCL आदि) को अपने नुकसान (Under Recovery) को पूरी तरह से खत्म करना है और मुनाफे में आना है, तो उन्हें रातों-रात पेट्रोल की कीमत में 18 रुपये और डीजल की कीमत में 25 रुपये प्रति लीटर का इजाफा करना होगा।
अमेरिका-ईरान तनाव: युद्ध की आग में जल रहा है कच्चा तेल
अब सवाल यह उठता है कि आखिर कच्चा तेल इतना महंगा क्यों हो गया है? इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका और ईरान के बीच चल रहा भू-राजनीतिक (Geopolitical) संघर्ष है। यह संघर्ष अब अपने तीसरे महीने में प्रवेश कर चुका है। 10 मई को जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान द्वारा भेजे गए शांति प्रस्ताव को 'पूरी तरह से अस्वीकार्य' बताकर खारिज कर दिया, तो युद्ध रुकने की जो थोड़ी बहुत उम्मीदें थीं, वे भी खत्म हो गईं। इस एक बयान ने तेल बाजार में दहशत फैला दी।
आंकड़े गवाही देते हैं कि यह युद्ध भारत के लिए कितना नुकसानदायक है। पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल (PPAC) के डेटा के अनुसार, फरवरी के महीने में भारत के लिए कच्चे तेल की औसत आयात (Import) कीमत 69.01 डॉलर प्रति बैरल थी। लेकिन मई आते-आते यह कीमत सीधे उछलकर 104.68 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई।
जब 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमला किया था, उस वक्त ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) लगभग 72.50 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था। 11 मई तक यही कीमत 105 डॉलर तक पहुंच गई। युद्ध जब अपने चरम पर था, तब तो कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर प्रति बैरल के खतरनाक स्तर को भी पार कर गई थीं।
तो क्या एक साथ बढ़ेंगे 18 और 25 रुपये? जानिए सरकार का प्लान
सूत्रों के हवाले से यह खबर सामने आ रही है कि वित्त मंत्रालय, पेट्रोलियम मंत्रालय और सरकारी ऑयल मार्केटिंग कंपनियों के बीच इस गंभीर मुद्दे पर लगातार मैराथन बैठकें चल रही हैं। सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अगर पेट्रोल-डीजल के दाम एकदम से बढ़ा दिए गए, तो देश में महंगाई (Inflation) बेकाबू हो जाएगी। ट्रांसपोर्ट महंगा होने से फल, सब्जियां, राशन और रोजमर्रा की हर चीज महंगी हो जाएगी।
इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार पेट्रोल और डीजल के दामों में एकमुश्त भारी बढ़ोतरी (Shock Increase) करने से बचेगी। यानी 18 या 25 रुपये एक साथ नहीं बढ़ाए जाएंगे। इसके बजाय, जनता को धीरे-धीरे झटके देने की रणनीति अपनाई जा सकती है।
रिपोर्ट्स बताती हैं कि शुरुआत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 4 से 5 रुपये प्रति लीटर का इजाफा किया जा सकता है। इसके साथ ही आम आदमी के घर के बजट पर भी वार होगा, क्योंकि LPG सिलेंडर की कीमतों में भी 40 से 50 रुपये तक की बढ़ोतरी किए जाने की पूरी संभावना है। आगे चलकर कीमतें कितनी बढ़ेंगी, यह पूरी तरह से ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल के भाव और सरकार की आर्थिक रणनीति पर निर्भर करेगा।
भारत के लिए आगे कितना बड़ा है खतरा?
Grant Thornton Bharat के ऑयल एंड गैस पार्टनर सौरव मित्रा ने इस पूरी स्थिति का बहुत बारीकी से विश्लेषण किया है। उनका कहना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक 65 से 70 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहती हैं, तो भारत में तेल की कीमतें बढ़ाना लगभग तय है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि भारत में अप्रैल 2022 से पेट्रोल और डीजल की रिटेल कीमतें लगभग स्थिर बनी हुई हैं। लंबे समय तक दाम न बढ़ने की वजह से OMCs के मार्जिन पर बहुत बुरा असर पड़ा है और कंपनियों की बैलेंस शीट बिगड़ती जा रही है।
हालांकि, राहत की बात यह है कि भारतीय रणनीतिकारों ने अलग-अलग देशों से (जैसे रूस से) तेल खरीदकर सप्लाई चैन के जोखिम को कुछ हद तक कम करने की कोशिश की है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि भारत अपनी जरूरत का 80 प्रतिशत से ज्यादा तेल आयात (Import) करता है।
भारत की सबसे बड़ी चिंता 'Strait of Hormuz' (होर्मुज जलडमरूमध्य) जैसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापारिक मार्ग को लेकर है। दुनिया भर का बहुत बड़ा तेल व्यापार इसी रास्ते से होता है और भारत भी इस पर काफी ज्यादा निर्भर है। 28 फरवरी से शुरू हुए तनाव के बाद से यह अहम मार्ग बुरी तरह प्रभावित हुआ है। अगर वहां हालात और बिगड़ते हैं, तो सप्लाई चेन टूट सकती है, जिससे भारत में तेल का संकट और गहरा सकता है।
कुल मिलाकर स्थिति यह है कि सरकार और तेल कंपनियों के लिए अब पुरानी कीमतों पर पेट्रोल और डीजल बेचना नामुमकिन सा हो गया है। सरकार सरकारी खर्च, कंपनियों के डूबते बहीखाते और आम जनता की महंगाई के बीच एक संतुलन बनाने की जद्दोजहद कर रही है। हालांकि एक साथ 18 या 25 रुपये की बढ़ोतरी नहीं होगी, लेकिन यह लगभग तय हो चुका है कि आने वाले कुछ ही दिनों में पेट्रोल पंप के मीटर तेजी से भागते हुए नजर आएंगे और आपको अपनी जेब पहले से ज्यादा ढीली करनी पड़ेगी। ऐसे में, जब तक दाम नहीं बढ़ते, तब तक फ्यूल का समझदारी से इस्तेमाल करना ही सबसे बेहतर विकल्प है।
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