SEBI new rules, Share buyback process: शेयर बाजार के निवेशकों के लिए बड़ी खबर! SEBI ने शेयर बायबैक प्रक्रिया को सिर्फ 66 दिनों में पूरा करने का नया प्रस्ताव दिया है। जानें इस नियम से आम निवेशकों को कैसे फायदा होगा।
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नई दिल्ली, 10 मई: अगर आप शेयर बाजार में पैसा लगाते हैं, तो आपके लिए एक बहुत अच्छी खबर है। अक्सर देखा जाता है कि जब कोई कंपनी अपने शेयर वापस खरीदने (Share Buyback) का ऐलान करती है, तो इस पूरी प्रक्रिया में काफी लंबा वक्त लग जाता है। निवेशकों को अपने ही पैसों के लिए महीनों तक इंतजार करना पड़ता है। लेकिन अब, बाजार नियामक सेबी (SEBI - Securities and Exchange Board of India) ने इस समस्या को जड़ से खत्म करने का मन बना लिया है।
सेबी ने शेयर बायबैक प्रक्रिया को ज्यादा मजबूत, आसान और तेज बनाने के लिए कुछ नए और अहम प्रस्ताव पेश किए हैं। इन नए नियमों के लागू होने के बाद, कंपनियों को अपना बायबैक सिर्फ 66 वर्किंग दिनों के अंदर पूरा करना होगा। आइए इस खबर को विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि इससे आम निवेशकों को क्या फायदा होने वाला है।
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66 दिनों की समयसीमा: निवेशकों के लिए बड़ी राहत
अभी तक बायबैक की प्रक्रिया काफी लंबी और थकाऊ होती थी। लेकिन अब सेबी ने प्राइमरी मार्केट एडवाइजरी कमिटी (Primary Market Advisory Committee) के साथ लंबी चर्चा और आंतरिक विचार-विमर्श के बाद यह तय किया है कि इस प्रोसेस को तेज किया जाए।
इस साल अप्रैल में ही सेबी ने स्टॉक एक्सचेंज के जरिए ओपन मार्केट बायबैक (Open Market Buyback) को फिर से शुरू करने का प्रस्ताव रखा था। अब जो नई दरख्वास्त आई है, उसके मुताबिक कंपनियों को स्टॉक एक्सचेंज के माध्यम से ओपन मार्केट बायबैक करने की मंजूरी दी जाएगी, लेकिन इसके लिए अधिकतम 66 कार्य दिवसों (Working Days) की समयसीमा तय की गई है। इसका सीधा मतलब यह है कि निवेशकों का पैसा लंबे समय तक नहीं फँसेगा और उन्हें तुरंत लिक्विडिटी का फायदा मिलेगा।
40 प्रतिशत फंड का इस्तेमाल करना होगा जरूरी
सेबी ने अपनी गाइडलाइंस में एक और बहुत ही महत्वपूर्ण सुझाव दिया है। नियामक के अनुसार, बायबैक ऑफर के पहले हाफ (शुरुआती आधे समय) में ही बायबैक के लिए तय की गई कुल रकम का कम से कम 40 प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल हो जाना चाहिए।
हालांकि, इस मामले में प्राइमरी मार्केट एडवाइजरी कमिटी ने थोड़ी अलग सलाह दी थी। कमिटी का कहना था कि बायबैक पूरा करने के लिए 6 महीने का समय दिया जाए और शुरुआती समय में 50 प्रतिशत फंड का इस्तेमाल हो। लेकिन सेबी ने बाजार की तेजी और निवेशकों के हित को देखते हुए 66 दिनों वाला नियम ही ज्यादा सही माना है।
लंबी प्रक्रिया से खत्म हो जाता है बायबैक का महत्व
सेबी ने साफ तौर पर कहा है कि फाइनेंस एक्ट 2026 (Finance Act 2026) के तहत कंपनियों के लिए दो बायबैक ऑफर के बीच के गैप (अंतराल) को नियंत्रित करने वाले नियमों में बदलाव किए जा रहे हैं। एक बैलेंस और मजबूत सिस्टम बनाने के लिए 66 दिनों का समय एकदम सटीक है।
सेबी का मानना है कि शेयर बाजार हर दिन बदलता है। अगर बायबैक की प्रक्रिया 6 महीने से ज्यादा समय तक खिंच जाती है, तो बाजार की बदलती परिस्थितियों में उस बायबैक का कोई खास महत्व नहीं रह जाता। इसके अलावा, एक लंबी प्रक्रिया के कारण आम शेयरधारकों के लिए अपने शेयरों और बायबैक के स्टेटस को ट्रैक करना बहुत मुश्किल हो जाता है।
मर्चेंट बैंकर की अनिवार्यता खत्म करने का प्रपोजल
सेबी ने नियमों को आसान बनाने के लिए सिर्फ समयसीमा ही नहीं घटाई है, बल्कि कागजी और कानूनी प्रक्रियाओं को भी सरल किया है।
- वैकल्पिक हुई मर्चेंट बैंकर की भूमिका: सेबी ने प्रस्ताव दिया है कि बायबैक के लिए मर्चेंट बैंकर (Merchant Banker) की नियुक्ति को अब वैकल्पिक (Optional) बना दिया जाए।
- जिम्मेदारियों का बंटवारा: वर्तमान में जो जिम्मेदारियां मर्चेंट बैंकर उठाते हैं, उन्हें अब कंपनी, स्टॉक एक्सचेंज और सेक्रेटेरियल ऑडिटर्स के बीच आपस में बांटा जा सकता है। इससे कंपनियों का खर्च बचेगा और प्रक्रिया में तेजी आएगी।
प्रमोटर्स के शेयर होंगे फ्रीज
बाजार में किसी भी तरह की हेराफेरी या इनसाइडर ट्रेडिंग को रोकने के लिए सेबी ने एक बहुत ही सख्त नियम का भी प्रस्ताव रखा है। नई दरख्वास्त के अनुसार, बायबैक की अवधि के दौरान कंपनी के प्रमोटर्स और उनके सहयोगियों के पास मौजूद शेयर और अन्य सिक्योरिटीज को ISIN (International Securities Identification Number) के स्तर पर फ्रीज किया जा सकता है। इससे बायबैक के दौरान पारदर्शिता बनी रहेगी।
खत्म होगी अलग ट्रेडिंग विंडो की जरूरत
अभी तक बायबैक ट्रांजैक्शन के लिए स्टॉक मार्केट में एक अलग ट्रेडिंग विंडो (Separate Trading Window) की जरूरत होती थी। सेबी ने अब इसे भी पूरी तरह से हटाने का प्रपोजल रखा है।
- सामान्य बाजार से होगा काम: इसके तहत, अब बायबैक के जितने भी लेन-देन होंगे, वे सामान्य बाजार पद्धति (Regular Market Mechanism) के जरिए ही पूरे किए जाएंगे।
- पहचान छुपाने की सुविधा: ट्रेडिंग स्क्रीन पर अब कंपनी को खरीदार के रूप में अलग से पहचानने की जरूरत भी खत्म हो सकती है।
न्यूनतम पब्लिक शेयरहोल्डिंग का रखना होगा ध्यान
इन सबके अलावा, सेबी ने दो बायबैक ऑफर्स के बीच के समय को कंपनी एक्ट 2013 (Companies Act 2013) के नियमों के साथ जोड़ने का भी प्रस्ताव दिया है। नियामक ने एक स्पष्ट शर्त यह भी रखी है कि कोई भी कंपनी बायबैक करते समय 'न्यूनतम सार्वजनिक शेयरधारिता' (Minimum Public Shareholding) के नियमों का उल्लंघन नहीं करेगी। यानी, बाजार में आम पब्लिक के लिए जितने शेयर होने जरूरी हैं, उतने हर हाल में रहने चाहिए।
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कुल मिलाकर देखा जाए तो सेबी का यह नया कदम भारतीय शेयर बाजार को और अधिक पारदर्शी, तेज और निवेशक-अनुकूल बनाने की दिशा में एक मास्टरस्ट्रोक है। 66 दिनों के अंदर बायबैक पूरा होने से न सिर्फ निवेशकों का समय बचेगा, बल्कि कंपनियों को भी अपनी वित्तीय योजनाएं बनाने में आसानी होगी। अलग ट्रेडिंग विंडो का हटना और मर्चेंट बैंकर की अनिवार्यता खत्म होना यह दर्शाता है कि सेबी अब बाजार को फालतू की जटिलताओं से मुक्त करना चाहता है। अगर ये सारे प्रस्ताव जल्द ही लागू हो जाते हैं, तो यह कहना गलत नहीं होगा कि शेयरधारकों के लिए स्टॉक मार्केट में निवेश करना पहले से कहीं ज्यादा सुरक्षित और फायदेमंद हो जाएगा।

