RIL vs Reuters: ईरानी तेल डील पर क्यों भड़की रिलायंस? अमेरिकी प्रतिबंधों के बीच बड़ा विवाद

RIL Iranian oil: रिलायंस इंडस्ट्रीज (RIL) ने ईरान से 50 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदने की रॉयटर्स की रिपोर्ट को बेबुनियाद बताया है। जानें अमेरिकी प्रतिबंधों और तेल बाजार की पूरी सच्चाई।

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नई दिल्ली, 26 मार्चः दुनियाभर में कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई और कीमतों को लेकर हमेशा से एक हलचल बनी रहती है। खासकर जब बात भारत जैसे बड़े आयातक देश की हो, तो हर खबर का सीधा असर ग्लोबल मार्केट पर पड़ता है। इसी बीच, भारत की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड (RIL) ने ग्लोबल मीडिया में चल रही उन तमाम रिपोर्टों को सिरे से खारिज कर दिया है, जिनमें दावा किया जा रहा था कि रिलायंस ने ईरान से कच्चा तेल खरीदा है। कंपनी ने गुरुवार को एक आधिकारिक बयान जारी कर इन सभी दावों को पूरी तरह से "बेबुनियाद" और "भ्रामक" करार दिया है।


यह स्पष्टीकरण ऐसे संवेदनशील समय में आया है, जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की आवाजाही (Crude Oil Flow) पर निगरानी एजेंसियों ने अपनी नजरें और भी पैनी कर दी हैं। आइए, इस पूरे विवाद को विस्तार से समझते हैं और जानते हैं कि आखिर इस खबर के पीछे का असली सच क्या है।


रिलायंस इंडस्ट्रीज का कड़ा और स्पष्ट जवाब

रिलायंस ने अपने बयान में बिना किसी लाग-लपेट के अपनी स्थिति साफ की है। गुरुवार को जारी प्रेस रिलीज में रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड की ओर से कहा गया, “RIL हालिया मीडिया रिपोर्टों को पूरी तरह से खारिज करता है, जिनमें यह दावा किया गया है कि कंपनी ने ईरानी मूल का कच्चा तेल खरीदा है। ये रिपोर्टें पूरी तरह से निराधार हैं और दुनिया के सामने भ्रामक तथा गलत दावे पेश कर रही हैं।”


इस बयान से यह साफ हो गया है कि रिलायंस अंतरराष्ट्रीय नियमों और अमेरिकी प्रतिबंधों का पूरी तरह से पालन कर रही है और किसी भी विवादित व्यापारिक गतिविधि का हिस्सा नहीं है।


क्या था रॉयटर्स की रिपोर्ट में दावा?

इस पूरे विवाद की शुरुआत इस सप्ताह की शुरुआत में हुई थी, जब दुनिया की जानी-मानी न्यूज एजेंसी रॉयटर्स (Reuters) ने एक रिपोर्ट पब्लिश की थी। इस रिपोर्ट में कई बड़े और चौंकाने वाले दावे किए गए थे:

  • 50 लाख बैरल का दावा: रिपोर्ट में कहा गया था कि गुजरात के जामनगर में दुनिया का सबसे बड़ा रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स चलाने वाली कंपनी रिलायंस ने नेशनल ईरानी ऑयल कंपनी (National Iranian Oil Company) से 50 लाख बैरल से भी ज्यादा ईरानी कच्चा तेल खरीदा है।

  • डिलीवरी पर सस्पेंस: हालांकि, रॉयटर्स की उस रिपोर्ट में इस बात का कोई साफ जिक्र नहीं था कि इस तेल की डिलीवरी कब होनी थी या कब हुई है।

  • प्रीमियम कीमत: रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया था कि रिलायंस ने इस ईरानी कच्चे तेल की कीमत ग्लोबल बेंचमार्क से ज्यादा यानी 'प्रीमियम' पर तय की है।


अब रिलायंस के ताजा बयान के बाद रॉयटर्स के ये सभी दावे हवा-हवाई साबित हो गए हैं।


ईरानी तेल पर अमेरिकी प्रतिबंध: 2019 से अब तक की स्थिति

इस खबर को गहराई से समझने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा। आपको बता दें कि साल 2019 से ही ईरान का वैश्विक तेल व्यापार काफी सीमित और मुश्किल भरा हो गया है।


साल 2019 में तत्कालीन अमेरिकी सरकार ने तेहरान (ईरान) पर परमाणु कार्यक्रम को लेकर कड़े प्रतिबंध (Sanctions) लगा दिए थे। इन प्रतिबंधों के लागू होते ही भारत सहित दुनिया के कई बड़े देशों ने ईरान से कच्चे तेल का आयात पूरी तरह से बंद कर दिया था। भारत हमेशा से अंतरराष्ट्रीय नियमों का सम्मान करता आया है।


तब से लेकर आज तक, ईरानी कच्चा तेल ज्यादातर चीन की रिफाइनरियों तक ही जाता है। वह भी सीधे तौर पर नहीं, बल्कि कई अप्रत्यक्ष (Indirect) और छिपे हुए तरीकों से।

यही कारण है कि जब रिलायंस जैसी प्रतिष्ठित भारतीय कंपनी का नाम ईरानी तेल से जोड़ा गया, तो मार्केट में हड़कंप मचना तय था।


अमेरिका ने दी है 30 दिन की विशेष राहत

हालांकि, हाल ही में अमेरिका की प्रतिबंध नीति (Sanctions Policy) में कुछ मामूली लेकिन अहम बदलाव देखने को मिले हैं। वॉशिंगटन ने कुछ विशेष शर्तों और तय समय-सीमा के तहत एक छोटी सी राहत का ऐलान किया है।


पिछले सप्ताह डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने समुद्र में पहले से ट्रांजिट (आवाजाही) में मौजूद ईरानी तेल की खरीद पर 30 दिनों की अस्थायी छूट दी है।

  • शर्तें: यह छूट केवल उन कार्गो (जहाजों) पर लागू होती है, जिनमें 20 मार्च तक ईरानी कच्चा तेल लोड किया जा चुका था। भले ही वे तेल प्रतिबंधित जहाजों पर ही क्यों न हों, इस सीमित समय के लिए उनके लेन-देन की अनुमति दी गई है।

  • डेडलाइन: इस राहत के साथ एक सख्त नियम यह भी है कि इन सभी कार्गो को हर हाल में 19 अप्रैल तक उतारना (Unload) जरूरी है। शायद इन्हीं नीतियों में हुए बदलावों के बीच कुछ मीडिया एजेंसियों को भ्रम हुआ और उन्होंने रिलायंस से जुड़ी गलत खबर प्रकाशित कर दी।


इंडियन ऑयल (IOC) का बड़ा कदम: कई साल बाद खरीदा ईरानी LPG

कच्चे तेल के इस विवाद से अलग, एक और बड़ी खबर भारतीय तेल बाजार से जुड़ी है। गुरुवार को ब्लूमबर्ग (Bloomberg) की एक अहम रिपोर्ट सामने आई। इस रिपोर्ट के अनुसार, भारत की सरकारी तेल कंपनी इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन (Indian Oil Corporation - IOC) ने कई वर्षों के लंबे अंतराल के बाद पहली बार ईरान से लिक्विफाइड पेट्रोलियम गैस (LPG) की खरीद की है।


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आखिर इंडियन ऑयल ने यह कदम क्यों उठाया?

दरअसल, पश्चिम एशिया (Middle East) में इस समय भारी भू-राजनीतिक संघर्ष और तनाव जारी है। इस तनाव के कारण ग्लोबल सप्लाई चेन पर भारी दबाव पड़ रहा है। भारत में घरेलू गैस (LPG) की मांग हमेशा ज्यादा रहती है। ऐसे में देश के भीतर आपूर्ति (Supply) को सुचारू बनाए रखने और किसी भी तरह के दबाव को संभालने के लिए IOC ने यह रणनीतिक कदम उठाया है। LPG की खरीद कच्चे तेल की खरीद से अलग होती है और इसे मानवीय और घरेलू जरूरतों के नजरिए से देखा जाता है।


रूस बना भारत के लिए बड़ा विकल्प

ईरान से तेल आयात बंद होने के बाद और पश्चिम एशिया के तनाव के बीच, भारतीय रिफाइनरियों ने अपने लिए एक नया और मजबूत रास्ता खोज लिया है। हाल के कुछ हफ्तों और महीनों में भारतीय कंपनियों ने रूसी कच्चे तेल (Russian Crude Oil) की खरीद में काफी बढ़ोतरी की है।


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रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद शुरुआत में रूसी तेल पर कई पाबंदियां थीं, लेकिन धीरे-धीरे वैश्विक आपूर्ति संबंधी चिंताओं को देखते हुए इन प्रतिबंधों में कुछ ढील दी गई है। भारत ने अपने नागरिकों को सस्ता ईंधन उपलब्ध कराने और देश की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) को सुनिश्चित करने के लिए रूस से भारी मात्रा में डिस्काउंटेड कच्चा तेल खरीदा है।


रिलायंस इंडस्ट्रीज द्वारा रॉयटर्स की रिपोर्ट का खंडन करना इस बात का सबूत है कि भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को लेकर कितनी सतर्क हैं। ग्लोबल ऑयल मार्केट इस समय बेहद संवेदनशील दौर से गुजर रहा है। एक तरफ अमेरिका की नीतियां हैं, दूसरी तरफ पश्चिम एशिया का तनाव है। ऐसे में भारत सरकार और भारतीय तेल कंपनियां (चाहे वह रिलायंस हो या इंडियन ऑयल) बहुत ही सधे हुए कदम उठा रही हैं। भारत का मुख्य लक्ष्य किसी भी विवाद से बचते हुए देश की ऊर्जा जरूरतों को बिना किसी रुकावट के पूरा करना है।


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