RERA Update 2026: सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी, बिल्डरों पर कसा शिकंजा | घर खरीदारों को बड़ी राहत

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RERA Update 2026: लाखों घर खरीदारों को बिल्डरों की मनमानी से बचाने के लिए बनाए गए रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (RERA) कानून को लेकर देश की सर्वोच्च अदालत ने अब तक की सबसे तल्ख टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने RERA के लचर कामकाज पर गहरी नाराजगी जताते हुए यहां तक कह दिया है कि अगर यह संस्था ठीक से काम नहीं कर सकती, तो इसके होने का क्या मतलब है? कोर्ट की इस सख्ती ने पूरे रियल एस्टेट सेक्टर में खलबली मचा दी है।

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जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ एक टिप्पणी नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह इस बात का संकेत है कि अब सिर्फ कानून की किताबों में होने से काम नहीं चलेगा, उसे जमीन पर सख्ती से लागू करना होगा। इस लेख में हम आसान भाषा में समझेंगे कि सुप्रीम कोर्ट क्यों नाराज है, इस फैसले का आप पर, यानी घर खरीदारों और बिल्डरों पर क्या असर होगा, और रियल एस्टेट का भविष्य अब किस दिशा में जा सकता है।


क्यों नाराज है सुप्रीम कोर्ट? RERA पर उठे गंभीर सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि कई राज्यों में RERA प्राधिकरण डिफॉल्टर बिल्डरों पर कार्रवाई करने के बजाय उन्हें बचाने का काम करते दिख रहे हैं। अदालत का मानना है कि जिस संस्था को घर खरीदारों का रक्षक होना चाहिए था, वह कई मामलों में कमजोर साबित हुई है।


यह गुस्सा बेवजह नहीं है। देश भर में हजारों खरीदार ऐसे हैं जिनकी शिकायतें RERA में सालों से धूल फांक रही हैं। प्रोजेक्ट में देरी, पैसों का दुरउपयोग, और वादों से मुकरना आम बात हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी इसी दुखती रग पर हाथ रखने जैसी है। अब यह साफ हो गया है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को RERA के कामकाज की समीक्षा करनी होगी और इसकी जवाबदेही तय करनी होगी।


बिल्डरों पर क्या होगा असर? छोटों की मुश्किलें बढ़ेंगी, बड़ों को फायदा

सुप्रीम कोर्ट की इस सख्ती का सीधा असर रियल एस्टेट डेवलपर्स पर पड़ना तय है। बाजार के विश्लेषकों का मानना है कि इसका प्रभाव दो तरह से देखा जा सकता है:

  • छोटे और गैर-जिम्मेदार बिल्डरों के लिए मुश्किल: वे डेवलपर्स जो परियोजनाओं को समय पर पूरा नहीं करते, वित्तीय अनुशासन का पालन नहीं करते, या खरीदारों के पैसे को एक प्रोजेक्ट से दूसरे प्रोजेक्ट में लगाते हैं, उनके लिए बाजार में टिकना मुश्किल हो जाएगा। RERA की सख्ती बढ़ने पर ऐसे बिल्डरों पर भारी जुर्माना लग सकता है और उनके प्रोजेक्ट्स रद्द भी हो सकते हैं।

  • बड़े और संगठित डेवलपर्स को लाभ: वहीं दूसरी ओर, जो बड़े डेवलपर्स अच्छी वित्तीय स्थिति और कॉरपोरेट गवर्नेंस के साथ काम करते हैं, उन्हें इसका फायदा मिलेगा। जब बाजार से गैर-जिम्मेदार खिलाड़ी बाहर होंगे, तो खरीदारों और निवेशकों का भरोसा संगठित और विश्वसनीय कंपनियों पर बढ़ेगा। 'अनारॉक' के चेयरमैन अनुज पुरी का भी मानना है कि इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और डेवलपर्स पर समय पर काम पूरा करने का दबाव बनेगा।


अश्विन शेठ ग्रुप के मुख्य व्यवसाय अधिकारी भाविक भंडारी के अनुसार, अब डेवलपर्स को पूंजी प्रबंधन, समय पर डिलीवरी और बेहतर शासन व्यवस्था को पहले से कहीं ज्यादा गंभीरता से लेना होगा।


घर खरीदारों के लिए बड़ी राहत, अब मिलेंगे ये फायदे

यह पूरा घटनाक्रम घर खरीदने का सपना देखने वाले आम लोगों के लिए एक बड़ी और सकारात्मक खबर है। अगर RERA वाकई सख्त हो जाता है, तो खरीदारों को कई सीधे फायदे होंगे:


  • तेजी से होगा शिकायतों का निपटारा: सालों तक इंतजार करने के बजाय, शिकायतों पर जल्द सुनवाई और फैसले की उम्मीद बढ़ेगी।


  • पैसों की सुरक्षा: एस्क्रो खातों (जिसमें प्रोजेक्ट का 70% पैसा रखा जाता है) की निगरानी सख्त होगी, जिससे बिल्डर आपके पैसे का दुरुपयोग नहीं कर पाएगा।


  • समय पर मिलेगा घर: प्रोजेक्ट की डेडलाइन की सख्त निगरानी होगी, जिससे बिल्डरों को समय पर घर देने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।


  • बढ़ेगा भरोसा: जब लोगों को यह विश्वास होगा कि उनकी सुनवाई के लिए एक मजबूत और निष्पक्ष संस्था है, तो रियल एस्टेट सेक्टर में उनका भरोसा लौटेगा।


कानून मजबूत, लेकिन अमल में बड़ी खामियां

कई एक्सपर्ट्स मानते हैं कि RERA कानून अपने आप में बहुत मजबूत है, लेकिन समस्या इसके लागू होने के तरीके में है। फोरम फॉर पीपल्स कलेक्टिव एफर्ट्स के अध्यक्ष अभय उपाध्याय, जो RERA की केंद्रीय सलाहकार परिषद के सदस्य भी हैं, कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कानून पर नहीं, बल्कि उसके कमजोर क्रियान्वयन पर चिंता जताई है।


उन्होंने जुर्माने की व्यवस्था पर भी बड़ा सवाल उठाया। उनके मुताबिक, "जब नियमों का उल्लंघन करने पर सिर्फ 10,000 से 15,000 रुपये का मामूली जुर्माना लगता है, तो कोई बिल्डर नियमों का पालन क्यों करेगा? उल्लंघन करना तो सस्ता पड़ता है।" बार-बार नोटिस भेजना और कोई ठोस कार्रवाई न करना RERA के उद्देश्य को ही कमजोर कर देता है। कई मामलों में 'RERA रजिस्टर्ड' का टैग सिर्फ एक मार्केटिंग टूल बनकर रह गया है, जबकि इसे भरोसे की गारंटी होना चाहिए था।


सिक्के का दूसरा पहलू: RERA की इन उपलब्धियों को न करें नजरअंदाज

आलोचनाओं के बीच यह भी मानना होगा कि RERA ने पिछले 8 सालों में भारतीय रियल एस्टेट में कई बड़े और सकारात्मक बदलाव किए हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता:


  • फंड डायवर्जन पर रोक: प्रोजेक्ट का 70% पैसा एस्क्रो खाते में रखने की अनिवार्यता ने बिल्डरों द्वारा फंड के दुरुपयोग पर काफी हद तक रोक लगाई है।
  • पारदर्शिता बढ़ी: 'कार्पेट एरिया' की स्पष्ट परिभाषा ने खरीदारों को धोखे से बचाया है। अब बिल्डर सुपर एरिया के नाम पर भ्रमित नहीं कर सकते।

  • निवेशकों का भरोसा लौटा: नाइट फ्रैंक इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, RERA के बाद सेक्टर में पारदर्शिता बढ़ी, जिससे प्राइवेट इक्विटी निवेश में भारी उछाल आया। 2011-2016 के बीच यह निवेश 17.5 अरब डॉलर था, जो 2017-2020 के बीच बढ़कर 26 अरब डॉलर हो गया।


आंकड़े बयां करते हैं कहानी: RERA का अब तक का सफर

पंजीकरण: देशभर में अब तक 99,000 से ज्यादा प्रोजेक्ट्स और 1.12 लाख से ज्यादा रियल एस्टेट एजेंट्स RERA के तहत पंजीकृत हो चुके हैं।

अग्रणी राज्य: महाराष्ट्र 50,000 से अधिक प्रोजेक्ट्स के साथ सबसे आगे है, जिसके बाद गुजरात (7,500+) का स्थान है।

मामलों का निपटारा: 9 फरवरी, 2026 तक, देश के 27 राज्यों में RERA ट्रिब्यूनल ने मिलकर 1.55 लाख से अधिक शिकायतों का निपटारा किया है। इसमें उत्तर प्रदेश (52,047 मामले) सबसे आगे है, जिसके बाद महाराष्ट्र (27,006) और हरियाणा (16,531) हैं।

ये आंकड़े दिखाते हैं कि कानून का ढांचा तो तैयार है, लेकिन उसकी आत्मा यानी 'प्रभावी क्रियान्वयन' अभी भी कई जगहों पर कमजोर है।


आगे की राह क्या है?

सुप्रीम कोर्ट की फटकार एक तरह से RERA के लिए 'वेक-अप कॉल' है। यह स्पष्ट हो गया है कि अब केवल कानून बनाने से काम नहीं चलेगा, उसे सख्ती और ईमानदारी से लागू करना होगा। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब फोकस कुछ अहम सुधारों पर होना चाहिए:

  • एक समान कानून: सभी राज्यों में RERA के नियमों को एक समान और सख्ती से लागू किया जाए।

  • जवाबदेही तय हो: जो RERA प्राधिकरण ठीक से काम नहीं कर रहे हैं, उनकी जवाबदेही तय की जाए।
  • भारी जुर्माना: नियमों का उल्लंघन करने पर मामूली नहीं, बल्कि भारी जुर्माना लगाया जाए ताकि यह एक निवारक के रूप में काम करे।

  • अटकी परियोजनाओं पर फोकस: अटके हुए प्रोजेक्ट्स को पुनर्जीवित करने के लिए कानून में लक्षित संशोधन किए जाएं। कुल मिलाकर, आने वाला समय रियल एस्टेट सेक्टर के लिए निर्णायक साबित हो सकता है। यदि RERA प्राधिकरण सुप्रीम कोर्ट के संदेश को गंभीरता से लेते हैं, तो यह न केवल लाखों घर खरीदारों के लिए एक बड़ी जीत होगी, बल्कि यह पूरे रियल एस्टेट उद्योग को अधिक पारदर्शी, भरोसेमंद और जिम्मेदार बनाएगा।


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